बेंगलुरु के एक पॉश अपार्टमेंट में 76 वर्षीय पूर्व इसरो वैज्ञानिक द्वारा अपनी बीमार पत्नी की हत्या और फिर आत्महत्या का प्रयास, केवल एक अपराध नहीं बल्कि हमारे समाज की सामूहिक हार है। जो मस्तिष्क कभी अंतरिक्ष के रहस्यों को सुलझाता था, वह जीवन के संघर्षों के आगे इतना कमजोर कैसे पड़ गया कि ‘कातिल’ बन बैठा?
आत्मविश्वास की कमी या कायरता?
अक्सर ‘चिंता’ का बहाना बनाकर ऐसे अपराधों को ढकने की कोशिश की जाती है, लेकिन असल में यह आत्मविश्वास की घोर कमी है। प्रेम और विवाह का संकल्प ‘अंत तक सेवा’ करने का होता है, न कि डरकर जीवन छीन लेने का। किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार नहीं है कि वह अपनी कल्पनाओं के डर से किसी दूसरे की जीवनलीला समाप्त कर दे। यह कृत्य घिनौना है और समाज के लिए एक बेहद खतरनाक संदेश है।

मशीन बनते बच्चे, अनाथ होते बुजुर्ग
आज हम बच्चों को ‘सक्सेस’ की ऐसी अंधी दौड़ में धकेल रहे हैं जहाँ उनके पास डॉलर तो हैं, पर बीमार माता-पिता के लिए वक्त नहीं। जब सात समंदर पार बैठा खून का रिश्ता सिर्फ एक वीडियो कॉल तक सिमट जाता है, तब घर की दीवारें काटने को दौड़ती हैं। हमने बच्चों को अच्छी डिग्री तो दी, लेकिन उन्हें ‘इंसानियत’ और ‘सेवा’ का पाठ पढ़ाना भूल गए।
इंदौर की माटी और हमारा कर्तव्य
हम देवी अहिल्या की नगरी के निवासी हैं, जहाँ सेवा ही परम धर्म है। इंदौर केवल स्वच्छता में ही नहीं, बल्कि आपसी जुड़ाव में भी मिसाल रहा है। लेकिन बढ़ते शहरीकरण ने हमें भी पड़ोसियों से दूर कर दिया है। आज जरूरत है कि हम अपने आसपास अकेले रह रहे बुजुर्गों का सहारा बनें, ताकि कोई और ‘वेंकटेश’ निराशा के उस गर्त में न गिरे जहाँ उसे मौत ही एकमात्र रास्ता दिखने लगे।
इस घटना का निष्कर्ष यह है : सफलता का पैमाना बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि बुढ़ापे में माता-पिता की आँखों में दिखने वाला संतोष होना चाहिए। बच्चों को आसमान छूने के पंख जरूर दें, लेकिन उन्हें अपनी जड़ों की ओर लौटने का रास्ता भी याद दिलाते रहें।
राजेश निगम
प्रदेश अध्यक्ष (मध्यप्रदेश)
भारतीय पत्रकार सुरक्षा परिषद
