₹1000 के ‘फूफाजी’ और अखबार के पन्नों पर बने ‘नवागंतुक जमाई’!

(व्यंग्य लेख:)

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​पत्रकारिता के इस दौर में अब सबसे बड़ी चुनौती यह साबित हो चुकी है कि खबर को खबर की तरह छापा जाए या किसी के चंदे की रसीद की तरह! शहर के एक प्रतिष्ठित मंदिर के आयोजन के बाद जो महाभारत छिड़ी है, उसने समाज के उन “फूफाजी” किस्म के ठेकेदारों की पोल खोल दी है, जो हजार-पाँच सौ रुपए खर्च करके यह भूल जाते हैं कि वे किसी धार्मिक आयोजन के पुण्यार्शी हैं या अखबार के मुख्य शेयरधारक।
​इस पूरे महासंग्राम की पटकथा बड़ी दिलचस्प है। आयोजन की सारी भागदौड़ हमारे इन खास ‘फूफाजी’ ने की फूल-मालाओं से लेकर टेंट और प्रसाद तक, पसीना उन्होंने बहाया। लेकिन जब अखबार खुला, तो वहां नजारा कुछ और ही था। तस्वीर छप गई किसी ऐसे अनजान व्यक्ति की, जिसे आयोजन से शायद उतना ही मतलब था जितना कछुए को अंतरिक्ष से! बस, फिर क्या था; हमारे फूफाजी का पारा सीधे सातवें आसमान पर पहुँच गया।
​उनकी इस आहत आत्मा का दर्द यही था:- “पूरी मेहनत हमारी, पसीना हमारा, चंदे के पूरे ₹1000 हमारे, और अखबार में महिमामंडन किसी और का? वो अनजान शख्स तो ऐसे चमक रहा है जैसे इस आयोजन का मुख्य ‘जमाई’ वही हो, और हम यानी फूफाजी सीधे तेल लेने चले गए हों!” 😅
​अरे साहब, क्या अखबार अब आपका निजी मैरिज ब्यूरो या पब्लिसिटी कैटलॉग है, जो हर एक चंदा देने वाले की आरती उतारकर छापे? इन महानुभावों की सबसे बड़ी गलतफहमी यह होती है कि वे अखबार को अपनी बपौती समझ बैठते हैं। जब तक व्हाट्सएप ग्रुप पर अतिथियों के भारी-भरकम पदों वाला संदेश फॉरवर्ड किया गया, तब तक तो सब ठीक था; लेकिन जैसे ही वह अखबार के पन्नों पर छपकर सार्वजनिक हुआ, जनाब को याद आ गया कि अरे! इसमें तो हमारी चमकती हुई शक्ल गायब है!
​इस दर्दनाक धोखे के बाद हमारे फूफाजी ने जीवन का एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी संकल्प ले लिया है: * “कसम खाते हैं कि अब जीवन में कभी किसी आयोजन में अपनी एक फूटी कौड़ी यानी पूंजी खर्च नहीं करेंगे!”* भई, जब हजार रुपए निवेश करने पर ‘जमाई’ वाला सम्मान न मिले, तो ऐसे दान-पुण्य से क्या फायदा?
​अखबार प्रबंधन का रुख इस मामले में एकदम स्पष्ट और दो टूक है: “दान और पब्लिसिटी, दोनों अलग-अलग चीजें हैं, भाई!” यदि आप सेवा भाव से चंदा दे रहे हैं, तो उसका स्वागत है; लेकिन यदि आप यह सोच रहे हैं कि हजार रुपए देकर आप अखबार की संपादकीय नीति और पन्नों के मालिक बन जाएंगे, तो यह आपकी “अनोखी मानसिक भूल” है।
​यह लेख खास तौर पर उन महानुभावों के आईने के लिए है, जिन्हें लगता है कि अखबार उनकी बपौती है और वे जब चाहें संपादक की कलम को हाईजैक कर सकते हैं। अगली बार जब आप किसी आयोजन में हजार रुपए का योगदान दें, तो रसीद कटवाते वक्त यह जरूर पूछ लें कि “इस दान पर अखबार का पन्ना और पहली फुर्सत में ‘जमाई’ वाला स्वागत मुफ्त मिलेगा या नहीं?” ताकि फूफाजी को बाद में रूठने का मौका ही न मिले! 😅😜
​— राजेश निगम, इंदौर (भारत श्रेया टाइम्स )
म.प्र. प्रदेश अध्यक्ष, भारतीय पत्रकार सुरक्षा परिषद एवं अ.भा. कायस्थ महासभा

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