विज्ञापन पर करोड़ों का ‘जश्न’, पर सरकारी स्कूलों में क्यों है ‘सन्नाटा’?


नेपाल की तर्ज पर भारत में भी अनिवार्य हो अधिकारियों के बच्चों की सरकारी शिक्षा; तभी सुधरेगी व्यवस्थाराजेश निगम, इंदौर

​सरकारें अपनी पीठ थपथपाने के लिए जनता के टैक्स के करोड़ों रुपए विज्ञापनों पर पानी की तरह बहा देती हैं। चमचमाते होर्डिंग्स और अखबारों के पूरे पन्ने के विज्ञापनों में शिक्षा क्रांति के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि ये स्कूल इतने ही ‘विश्वस्तरीय’ हो गए हैं, तो बड़े आईएएस (IAS), आईपीएस (IPS) और मंत्रियों के बच्चे इन स्कूलों की दहलीज क्यों नहीं लांघते?
​नेपाल का साहसी कदम और भारत की मजबूरी
​हाल ही में नेपाल सरकार ने एक क्रांतिकारी योजना पर काम शुरू किया है, जिसके तहत निजी स्कूलों के वर्चस्व को खत्म कर सरकारी स्कूलों को प्राथमिकता दी जा रही है। वहाँ यह अनिवार्य करने की तैयारी है कि चाहे वीआईपी (VIP) हो या आम नागरिक, सबके बच्चे एक ही छत के नीचे सरकारी स्कूलों में पढ़ेंगे। दिल्ली सरकार ने भी सरकारी स्कूलों की कायापलट कर यह सिद्ध कर दिया कि यदि इच्छाशक्ति हो, तो सरकारी स्कूल भी प्राइवेट को मात दे सकते हैं।
​लेकिन मध्यप्रदेश और देश के अन्य हिस्सों में स्थिति ‘ढाक के तीन पात’ वाली क्यों है?


​जब ‘साहब’ का बच्चा पढ़ेगा, तब बदलेगा नजारा
​आज सरकारी स्कूलों की बदहाली का सबसे बड़ा कारण यह है कि जिला शिक्षा अधिकारी से लेकर कलेक्टर तक, किसी का भी निजी हित इन स्कूलों से नहीं जुड़ा है।
​जवाबदेही का अभाव: जब अधिकारी का बच्चा एयरकंडीशनर वाले प्राइवेट स्कूल में जाता है, तो उसे सरकारी स्कूल की टूटी छत, बिना बिजली के कमरों और शिक्षकों की कमी से कोई फर्क नहीं पड़ता।
​समानता का गला घोंटा: क्या यह विडंबना नहीं है कि जो अधिकारी सरकारी शिक्षा व्यवस्था को सुधारने की शपथ लेते हैं, वे खुद उस पर भरोसा नहीं करते?
​सिस्टम का सुधार: जिस दिन एक आईएएस और एक चपरासी का बच्चा एक ही टाट-पट्टी पर बैठकर पढ़ेगा, उस दिन स्कूल के शौचालय भी साफ होंगे, पानी भी शुद्ध आएगा और शिक्षक भी समय पर पढ़ाएंगे। फिर किसी निरीक्षण की जरूरत नहीं पड़ेगी, सिस्टम अपने आप सुधरेगा।
​विज्ञापनों की चमक बनाम स्कूलों की कालिख
​सरकार अपनी तारीफ के विज्ञापनों पर जितना खर्च एक महीने में करती है, उतने में कई सरकारी स्कूलों की सूरत बदली जा सकती है। यह जनता के खून-पसीने की कमाई का अपमान है कि देश की ‘रीढ़ की हड्डी’ यानी शिक्षा को विज्ञापन की चमक के पीछे छिपाया जा रहा है।
​सीधे सवाल:
​क्या सरकार में इतना साहस है कि वह नेपाल जैसा कानून लागू कर सके?
​क्या राजनेताओं और अधिकारियों के लिए अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में भेजना ‘अनिवार्य’ (Compulsory) किया जाएगा?
​क्या विज्ञापन पर खर्च होने वाला जनता का टैक्स वास्तव में स्कूलों के बुनियादी ढांचे पर खर्च होगा?
अब जरूरी है ​शिक्षा में समानता केवल भाषणों से नहीं आएगी। इसके लिए कड़े और कड़वे फैसले लेने होंगे। यदि सरकारी स्कूल अधिकारियों के बच्चों के लायक नहीं हैं, तो वे गरीब के बच्चों के लायक कैसे हो सकते हैं? शासन को अब विज्ञापनों के शोर से बाहर निकलकर धरातल पर सुधार करना होगा। देश की मेधा और भविष्य को बचाने का यही एकमात्र रास्ता है।
राजेश निगम, इंदौर
प्रदेश अध्यक्ष (मध्यप्रदेश)
भारतीय पत्रकार सुरक्षा परिषद

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