​तटरक्षक प्रहरियों का मान और भविष्य का संबल: निश्चित सुरक्षा, पारिवारिक आश्रितों के अधिकार और आधुनिक विकल्पों की सार्थक राह

वरिष्ठ पत्रकार राजेश निगम

​समुद्र की अथाह और असीम गहराइयों के बीच, जहाँ लहरें हर पल चुनौती बनकर टकराती हैं, देश की समुद्री सीमाओं की हिफाजत करने वाले भारतीय तटरक्षक बल (Indian Coast Guard) के जवान अदम्य साहस का परिचय देते हैं। राष्ट्र की रक्षा में अपने जीवन के सबसे स्वर्णिम वर्ष समर्पित कर देने वाले इन प्रहरियों का सेवा-काल जितना कठिन और अनुशासनबद्ध होता है, उनका सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन और उनके जाने के पश्चात उनके परिवार का भविष्य उतना ही सम्मानजनक और आर्थिक रूप से सुरक्षित होना चाहिए।


​जब इन वीर कर्मियों की सामाजिक सुरक्षा और पेंशन के स्वरूप पर चर्चा होती है, तो यह विषय केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और एक व्यावहारिक पारिवारिक सुरक्षा का बन जाता है। किसी भी कर्मचारी की अनुपस्थिति में उसके आश्रित (पति या पत्नी) पर क्या बीतती है, यह पहलू इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण हिस्सा है।


​1. पारिवारिक सुरक्षा का मानवीय पहलू और पुरानी पेंशन (OPS) का संबल
​एक व्यापक वर्ग का यह दृढ़ विश्वास है कि वर्दी में रहकर देश की सेवा करने वालों के लिए भविष्य की अनिश्चितता सबसे बड़ा मानसिक तनाव होती है।


🔹 ​आश्रितों को लाभ: पुरानी पेंशन योजना (OPS) के अंतर्गत कर्मचारी के जीवित न रहने पर उसके आश्रित पति या पत्नी के लिए ‘पारिवारिक पेंशन’ (Family Pension) का स्पष्ट और निश्चित प्रावधान है। इसमें आश्रित को बिना किसी मासिक अंशदान के जीवनभर एक नियमित और अनुमानित वित्तीय संबल मिलता है, जिससे उसे बुढ़ापे में किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता।


🔹 ​व्यवहारिक हानि या जोखिम: इस योजना में बाजार आधारित वृद्धि या एकमुश्त (Lump-sum) बड़ा फंड मिलने का विकल्प नहीं होता, जो कई बार तेजी से बदलती महंगाई के दौर में सीमित लग सकता है, लेकिन इसमें निरंतरता और निश्चितता की पूर्ण गारंटी होती है।
​2. आधुनिक वित्तीय गतिकी और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के नफे-नुकसान


​दूसरी ओर, राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) के पैरोकार इसे एक प्रगतिशील और आधुनिक कदम के रूप में देखते हैं।
🔹 ​आश्रितों को लाभ (और उसकी जटिलताएं): कर्मचारी की मृत्यु की स्थिति में NPS के तहत संचित कोष (Accumulated Corpus) का एक बड़ा हिस्सा (नियमों के तहत 80% तक) वार्षिकी (Annuity) खरीदने में उपयोग होता है, जिससे आश्रित को आजीवन पेंशन मिलती है, और शेष राशि एकमुश्त नॉमिनी को मिल जाती है। यदि बाजार का रिटर्न अच्छा रहा, तो यह फंड काफी बड़ा साबित हो सकता है।


🔹 ​व्यवहारिक हानि और गंभीर जोखिम: यहीं पर सबसे बड़ा व्यावहारिक संकट खड़ा होता है। NPS पूरी तरह बाजार के उतार-चढ़ाव (Equity & Debt Market Risk) पर निर्भर है। यदि किसी दुर्भाग्यपूर्ण समय में बाजार मंदी के दौर से गुजर रहा हो या फंड का प्रदर्शन खराब रहा हो, तो संचित कॉर्पस बहुत कम रह जाता है। ऐसे में आश्रित पति या पत्नी को मिलने वाली मासिक पेंशन इतनी कम हो सकती है कि उनका गुजारा चलना भी मुश्किल हो जाए। यह अनिश्चितता एक आश्रित परिवार के लिए सबसे बड़ा मानसिक और आर्थिक आघात साबित होती है।


🔹 ​3. सामंजस्य का मार्ग: “सांप भी मरे और लाठी भी न टूटे”
​यहाँ आकर एक ऐसा व्यावहारिक बिंदु उत्पन्न होता है जहाँ किसी एक पक्ष को पूरी तरह खारिज करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। वास्तविक बुद्धिमत्ता और नीतिगत सफलता इसी में है कि एक ऐसा मध्यम मार्ग निकाला जाए जो परिवार की सुरक्षा को सर्वोपरि रखे।
​इसके लिए नीति-निर्माताओं के समक्ष निम्नलिखित व्यावहारिक सुझाव रखे जा सकते हैं


🔹 न्यूनतम सुरक्षा की गारंटी (Floor Limit): बाजार आधारित प्रणालियों (NPS) में भी कर्मचारी की या उसके आश्रित की सुरक्षा के लिए एक ‘निश्चित न्यूनतम पारिवारिक पेंशन’ की कानूनी गारंटी होनी चाहिए, ताकि बाजार कितना भी गिरे, परिवार भुखमरी या लाचारी के कगार पर न पहुंचे।
🔹 विशेष संवर्ग के लिए संवेदनशीलता: सीमा सुरक्षा और तटरक्षक बल जैसे उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में कार्यरत कर्मियों के आश्रितों के लिए सिविल सेवाओं की तुलना में अधिक सुरक्षित और उदार प्रावधान किए जाएं।


विचारणीय बिंदु
​राष्ट्र का निर्माण केवल ईंट-पत्थरों से नहीं होता, बल्कि उन प्रहरियों के पसीने और उनके परिवारों के त्याग से होता है। जब देश के ये प्रहरी चैन की नींद सोते नागरिकों की रक्षा करते हैं, तो यह राष्ट्र का भी परम दायित्व है कि यदि कल को वह प्रहरी अपने परिवार के बीच न रहे, तो उसका जीवनसाथी और परिवार आर्थिक असुरक्षा के भंवर में न फंसे। यदि आधुनिक वित्तीय सुधारों के साथ पारंपरिक सुरक्षा और न्यूनतम गारंटी का एक सुंदर समन्वय बिठाया जा सके, तो न केवल कर्मचारियों का मनोबल सातवें आसमान पर होगा, बल्कि व्यवस्था पर उनका और उनके परिवारों का विश्वास भी अटूट बना रहेगा।
राजेश निगम
प्रदेश अध्यक्ष, भारतीय पत्रकार सुरक्षा परिषद एवं अ.भा. कायस्थ महासभा
(मीडिया प्रभारी)

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