Post Views: 1,826
जब शहरहित की आवाज को दबाने की कोशिश हो
इंदौर (राजेश निगम) : स्वच्छता, अनुशासन और कानून के कड़ाई से पालन के लिए देश ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में अपनी एक अलग और अनूठी पहचान बनाने वाला इंदौर शहर इन दिनों एक ऐसी घटना को लेकर चर्चा में है, जो हर संवेदनशील नागरिक को झकझोर कर रख रही है। यह मामला महज़ एक झड़प का नहीं है, बल्कि यह "लोकतंत्र में सवाल पूछने के अधिकार" और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर एक बड़ा सवालिया निशान लगाता है।
बाणगंगा और मरीमाता क्षेत्र में अवैध होर्डिंग्स के खिलाफ फेसबुक लाइव के जरिए शहर की व्यवस्था की पोल खोल रहे सामाजिक कार्यकर्ता प्रहलाद पांडेय के साथ हुई कथित मारपीट की घटना ने प्रशासन की कार्यशैली और सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।
नियम बनाम हकीकत: क्या इंदौर में "जीरो टॉलरेंस" सिर्फ कागजों तक सीमित है?
वैध और अवैध का दायरा: होर्डिंग वही वैध हैं जो नगर निगम की टेंडर प्रक्रिया, स्ट्रक्चरल इंजीनियर के सुरक्षा प्रमाणपत्र और ट्रैफिक पुलिस की एनओसी के बाद स्थापित होते हैं।
पूर्ण प्रतिबंध: सड़क के डिवाइडर, फुटपाथों और चौराहों के पास (25 से 50 मीटर के दायरे में) किसी भी प्रकार का विज्ञापन बोर्ड लगाना पूरी तरह प्रतिबंधित है ताकि चालकों का ध्यान न भटके।
बावजूद इसके, जब शहर की सड़कों पर अवैध होर्डिंग धड़ल्ले से नजर आते हैं और कोई सजग नागरिक इस विसंगति को उजागर करता है, तो उसे अपनी आवाज दबाने जैसी प्रताड़ना का सामना क्यों करना पड़ता है? क्या प्रशासन की ओर से विज्ञापनों को लेकर दिखाई जाने वाली सख्ती केवल चुनिंदा जगहों तक ही सीमित है?
बदलाव की पहली बूंद और प्रहलाद पांडेय का संघर्ष
“तपती धरती पर बारिश की पहली बूंद को तो शहीद होना पड़ता है, लेकिन बारिश इतनी तेज होनी चाहिए कि पहली बूंद का अस्तित्व भी खत्म न हो।”
आज इंदौर के इस खूबसूरत शहर को नंबर वन बनाए रखने और व्यवस्था की गंदगी को साफ करने के लिए, प्रहलाद पांडेय ने ठीक उसी बारिश की पहली बूंद की तरह जनधर्म निभाया है और अपना गहरा प्रभाव छोड़ दिया है।
अपनी इसी मुहिम के तहत जब वे मरीमाता चौराहे और बाणगंगा क्षेत्र के पास अवैध होर्डिंग्स की हकीकत जनता के सामने ला रहे थे, तब फेसबुक लाइव के दौरान कुछ लोग वहां पहुंचे। आरोप है कि उन्होंने प्रहलाद पांडेय के साथ अभद्रता व मारपीट की, उनका मोबाइल और माइक्रोफोन छीन लिया तथा रिकॉर्डेड वीडियो को डिलीट करने का दबाव बनाया।
प्रहलाद पांडेय ने इस पूरे घटनाक्रम में सीधे तौर पर क्षेत्र क्रमांक 3 के बीजेपी विधायक गोलू शुक्ला के समर्थकों पर मारपीट और दबाव बनाने के गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि, इस मामले में विधायक या उनके कार्यालय की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या टिप्पणी सामने नहीं आई है, लेकिन इस घटना ने कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं:
क्या एक आम नागरिक को अपने शहर के नियमों के उल्लंघन को सार्वजनिक करने का कोई अधिकार नहीं है?
क्या विरोध के स्वरों को इस तरह डराकर, धमकाकर चुप करा दिया जाएगा?
यदि प्रशासन अवैध होर्डिंग्स और पोस्टरों को हटाने को लेकर सचमुच गंभीर है, तो ऐसे मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं की जाती?
गांधी प्रतिमा के नीचे न्याय की आस: अब चुप रहना मुमकिन नहीं
इस घटना के बाद प्रहलाद पांडेय अपनी पत्नी के साथ रीगल चौराहे पर महात्मा गांधी की प्रतिमा के नीचे अनिश्चितकालीन धरने पर बैठ गए हैं। उनकी मांगें बिल्कुल साफ हैं संबंधित अवैध होर्डिंग्स को तुरंत हटाया जाए और उनके साथ हुई अभद्रता व मारपीट के मामले में कानून के मुताबिक निष्पक्ष जांच कर कड़ी कार्रवाई हो।
यह लड़ाई किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध की नहीं है। प्रहलाद पांडेय का राजनीतिक इतिहास चाहे जो रहा हो वे कभी अन्ना आंदोलन से जुड़े रहे हों या आम आदमी पार्टी के शुरुआती दौर के प्रवक्ता रहे हों, आज वे किसी राजनीतिक पद पर नहीं हैं। आज वे केवल एक जागरूक और मुखर नागरिक की भूमिका में हैं।
उनकी हर बात से हर कोई सहमत हो, यह कतई जरूरी नहीं है। लेकिन यह अकाट्य सत्य है कि लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार हर नागरिक का मौलिक अधिकार है।
इंदौर के नाम एक खुली अपील: शहरहित की आवाज को अकेला न छोड़ें
आज इंदौर को यह तय करना होगा कि क्या हमारा शहर ऐसा बनेगा जहाँ डराकर सच्चाई का गला घोंट दिया जाए, या फिर ऐसा जहाँ हर नागरिक बिना किसी भय के अपनी बात रख सके।
"आज प्रहलाद पांडेय रीगल चौराहे पर बैठे हैं। आपको उनकी राजनीति से इत्तेफाक रखने की कोई जरूरत नहीं है, लेकिन एक नागरिक के संवैधानिक अधिकार और शहरहित की आवाज के साथ खड़े होने के लिए वहां पहुंचना जरूरी है।”
यदि आज हम एक मुखर नागरिक की पीठ पीछे खड़े नहीं हुए, तो यह संदेश पूरे शहर में जाएगा कि व्यवस्था के खिलाफ सवाल उठाने वाला हर शख्स अकेला और असहाय है। आइए, रीगल चौराहे पर पहुंचें, उनकी बात सुनें, और इंदौर की उस मूल प्रवृत्ति को जीवंत रखें जो अन्याय और दबंगई के आगे कभी झुकना नहीं जानती।
इंदौर हमारा है और शहरहित की आवाज को अकेला नहीं छोड़ा जाना चाहिए।