मन की बात से मन की भड़ास तक: मिमिक्री का मलाल, भक्तों का विलाप और ‘गाइडलाइन’ का नया कानून!


​रेडियो का स्विच ऑन करते ही वह जानी-पहचानी और सुरीली आवाज़ गूंजती है: “मेरे प्यारे देशवासियों, नमस्कार!”


​यह आवाज़ सुनते ही देश का एक बड़ा वर्ग सीधे ऐसी तल्लीनता की मुद्रा में आ जाता है, मानों आज कोई दिव्य ज्ञान मिलने वाला हो। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि जिस देश में महीनों पहले से तय हो जाता है कि इस रविवार देशवासी किस पर विचार करेंगे, वहाँ असल में जनता के भीतर क्या चल रहा होता है?


​आइए, ‘मन की बात’ के इस एकतरफा कम्यूनिकेशन से थोड़ा आगे निकलकर, हाल ही में इंदौर के मंच पर हुई मिमिक्री, उस पर बिलबिलाते ‘अंधभक्तों’ के रुदन, और इस पूरे ड्रामे पर एक नया और अनूठा कानून बनाने की मांग पर एक बेहद तीखा और करारा व्यंग्य साधते हैं।


​रेडियो पर ‘मन की बात’ और लोकतंत्र का ‘सिंगल-चैनल’
​चुनी हुई समस्याएं: यहाँ सब कुछ इतना स्क्रिप्टेड और सैनिटाइज्ड होता है कि परीक्षा पे चर्चा से लेकर हर समस्या का समाधान चुटकियों में निकल आता है।
​प्रशस्ति पत्र का कोलाहल: कोई दूरदराज का कॉलर फोन पर यह बताते हुए गदगद हो जाता है कि उसने गमले में स्ट्रॉबेरी उगाकर देश की जीडीपी में चार चांद लगा दिए, और स्टूडियो में बैठी पूरी मशीनरी उसकी पीठ ठोकने लगती है।
​सुखद भ्रमजाल: यहाँ सब चंगा सी, और मस्त-मौला माहौल रहता है, जहाँ कोई अप्रिय सवाल पूछने की जुर्रत नहीं कर सकता। रिमोट हमेशा सरकार के हाथ में होता है।


​इंदौर का मंच, मिमिक्री का बम और भक्तों का ‘महा-विलाप’
​लेकिन जब यही राजनीति रेडियो के सुरक्षित स्टूडियो से उतरकर जमीन पर आती है, तो तमाशा कुछ और ही रंग दिखाता है। हाल ही में इंदौर में हुए एक राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान जब स्टैंड-अप कॉमेडियन पुलकित मणि ने प्रधानमंत्री मोदी की शैली और ‘माई फ्रेंड’ वाले अंदाज़ की मिमिक्री की, और वह चर्चित जुमला उछाला— “माँ को कुर्सी दो, माँ”—तो राजनीतिक पारे का तापमान सातवें आसमान पर पहुँच गया।
​राहुल गांधी की मौजूदगी में हुए इस कार्यक्रम में ‘अंधभक्तों’ की कार्यशैली पर भी जमकर प्रहार किया गया। बस फिर क्या था! ‘भक्त ब्रिगेड’ में ऐसा भूचाल आया कि वे सोशल मीडिया के हर कोने में छाती पीट-पीटकर बिलबिलाने लगे।
​इनकी शिकायत है कि प्रधानमंत्री की मिमिक्री और मां के गरिमामयी पद का यह प्रयोग अत्यंत अमर्यादित, असंसदीय और मातृशक्ति का सीधा अपमान है।
​लेकिन जनाब, यहीं से शुरू होती है हमारे दौर की सबसे बड़ी विडंबना और भारतीय राजनीति का सबसे काला और हिपोक्रिटिकल सच!
​याददाश्त का ‘सेलेक्टिव’ होना: जब मर्यादाएं और तहजीब ताक पर थीं
​आज जो ‘अंधभक्त’ ब्रिगेड नैतिकता और संस्कारों की सबसे ऊंची यूनिवर्सिटी के चांसलर बनकर ज्ञान बांट रहे हैं, उनकी याददाश्त का यह चयनात्मक (Selective) लोप वाकई किसी चमत्कार से कम नहीं है। क्या इन्हें वो दिन भूल गए जब राजनीतिक मंचों से विरोधियों के खिलाफ भाषा की हर शालीन सीमा को तार-तार कर दिया गया था?
​जब सार्वजनिक मंचों और चुनावी रैलियों से सोनिया गांधी के खिलाफ “10 करोड़ की गर्लफ्रेंड” जैसे बेहद भद्दे और घटिया संबोधन उछाले जाते थे, तब ये नैतिकता के ठेकेदार कहाँ दुबके बैठे थे?
​जब देश की एक पूर्व प्रधानमंत्री की दिवंगत पत्नी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेत्री के लिए “कांग्रेस की विधवा” जैसे अत्यंत अपमानजनक और अशोभनीय शब्दों के बाण चलाए जाते थे, तब क्या इनके संस्कारों को लकवा मार गया था?
​तब न तो किसी मातृशक्ति की गरिमा का ख्याल आया और न ही सार्वजनिक जीवन की शालीनता की याद सताई। उस वक्त तो इन बड़बोले भक्तों की तालियों और ठहाकों से पूरा आसमान गूंज रहा था, और आईटी सेल इस कीचड़ उछालने के उत्सव पर जश्न मना रहा था।
​अब तो संसद में ऐसा कानून बनना चाहिए!
​अंधभक्तों के इस दोहरे रवैये को देखकर तो अब मांग उठने लगी है कि सरकार को तुरंत एक नया और विशेष कानून बना देना चाहिए— “गाइडलाइन उल्लंघन निवारण एवं भक्त-व्यथा राहत कानून”।
​इस कानून के दायरे कुछ इस प्रकार होने चाहिए:
​नंबर 1: अगर कोई कॉमेडियन किसी सत्ताधीश की नकल उतारे, तो उसे सीधे राजद्रोह और ‘गाइडलाइन का उल्लंघन’ मानकर कॉलर टाइट कर दिया जाए।
​नंबर 2: लेकिन अगर पुराने समय में या आज भी विपक्ष की महिलाओं के लिए किसी ने अभद्र टिप्पणियां की हों, तो उसे ‘फ्री स्पीच’ और ‘मास्टरस्ट्रोक’ मानकर माफ कर दिया जाए और उस पर कोई गाइडलाइन लागू न हो!
​नंबर 3: जनता यदि अपनी खाली जेब, महंगाई और बेरोजगारी पर सवाल पूछे, तो उसे भी ‘मन की बात’ की गाइडलाइन का उल्लंघन घोषित कर दिया जाए।
अंततः: मन की बात से असलियत के बीच की खाई
​तर्क एकदम साफ और पारदर्शी है, जब दूसरों की माताओं, पत्नियों और परिवारों पर अभद्र टिप्पणियां होती हैं, तब इसे ‘राजनीतिक प्रहार’ मानकर रील्स बनाई जाती हैं। लेकिन जब बात खुद के आका तक पहुँचती है, तो तुरंत ‘गाइडलाइन’ टूट जाती है और लोकतंत्र सिहर उठता है।

​इस पूरे तमाशे के बीच, हताश और बेहाल जनता सिर्फ एक ही बात कहना चाहती है:-

​”नेताजी, आप रेडियो पर मन की बात सुनाते रहिए…

कॉमेडियन मंच पर मिमिक्री के जलवे दिखाते रहें…

अंधभक्त अपने दोहरे चरित्र और गाइडलाइन के नाम पर चाहे जितना बिलबिलाएं…

पर कम से कम अब तो हमारी जेब, चूल्हा, रोजगार और असली मुद्दों की बात सुन लीजिए!”

राजेश निगम, इंदौर
प्रदेश अध्यक्ष, भारतीय पत्रकार सुरक्षा परिषद एवं अखिल भारतीय कायस्थ महासभा

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