प्रमुख बिंदु (Highlights):
दूसरी बड़ी दुर्घटना: तीन पुलिया चौराहा हादसे के बाद अब पाटनीपुरा चौराहा पर गिरा अवैध स्वागत द्वार।
बाल-बाल बची जान: व्यस्त मार्ग पर अचानक गिरे इस गेट की चपेट में आने से कई बाइक और ई-रिक्शा दबे, कुछ नागरिक घायल।
न्याय और मानवता की मौत: हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेशों के बावजूद एफआईआर दर्ज करने से कतरा रहा प्रशासन और नगर निगम।
अनशन जारी: पिछले 8 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे पहलाद पांडे, लेकिन बहरी बनी बैठी है स्थानीय प्रशासनिक व्यवस्था।
विस्तारित समाचार रिपोर्ट:
इंदौर: 23 सितंबर 2026 शहर में नेताओं की वाहवाही और शक्ति प्रदर्शन के लिए लगाए जाने वाले अवैध होर्डिंग, बैनर और स्वागत द्वार अब आम जनता के लिए मौत का फंदा बनते जा रहे हैं। ताजा मामला पाटनीपुरा चौराहे का है, जहां एक विशालकाय अवैध स्वागत द्वार अचानक भरभराकर जमीन पर आ गिरा। गनीमत यह रही कि इस भीषण हादसे में कोई जनहानि नहीं हुई, वरना व्यस्त ट्रैफिक के बीच एक बड़ा नरसंहार भी हो सकता था। इस हादसे में कई दोपहिया वाहन और ई-रिक्शा मलबे के नीचे दब गए, जिससे कुछ लोग घायल भी हुए हैं।

दिलचस्प और शर्मनाक पहलू यह है कि इससे ठीक पहले इसी तरह का एक स्वागत द्वार तीन पुलिया चौराहे पर भी गिरा था, लेकिन इसके बावजूद नगर निगम और स्थानीय प्रशासन की नींद नहीं टूटी है।
न्याय, अधिकार और कर्तव्य सब मलबे में दबे
घटनास्थल पर केवल लोहे और फ्लेक्स का ढांचा ही नहीं गिरा, बल्कि इसके साथ ही शहर का कानून, न्याय, अधिकार और मानवीय संवेदनाएं भी मलबे के नीचे दबकर दम तोड़ चुकी हैं। चाटुकारिता की पराकाष्ठा पार कर चुके अधिकारी और महापौर इस कदर डरपोक हो चुके हैं कि माननीय उच्च न्यायालय (High Court) के स्पष्ट आदेशों के बावजूद अवैध होर्डिंग और स्वागत द्वार लगवाने वालों पर एफआईआर दर्ज करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।
अनशन पर बैठे हैं पहलाद पांडे, पर प्रशासन के कान में जूं नहीं रेंगी
शहर की इस लचर व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही के खिलाफ पहलाद पांडे पिछले आठ दिनों से लगातार भूख हड़ताल पर बैठे हुए हैं। वे इन अवैध और खतरनाक होर्डिंग्स व द्वारों के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय प्रशासन और नगर निगम के नुमाइंदों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। नेता अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने और वाहवाही लूटने के लिए नियमों की धज्जियां उड़ाकर शहर को हादसों के मुहाने पर खड़ा कर रहे हैं।

प्रशासन और नेताओं से तीखे सवाल (Prashasan aur Netaon se Teekhe Sawaal):
1. उच्च न्यायालय के आदेशों का मखौल क्यों? जब माननीय न्यायालय के सख्त निर्देश हैं, तो इंदौर प्रशासन अवैध स्वागत द्वार और होर्डिंग्स लगवाने वाले रसूखदारों पर आपराधिक मुकदमे (FIR) दर्ज करने से क्यों डर रहा है?
2. कितनी लाशों का इंतजार है? तीन पुलिया चौराहे पर हादसे के बाद भी सबक क्यों नहीं लिया गया? क्या प्रशासन किसी बड़े जनहानि (मौत) के इंतजार में आंखें मूंदकर बैठा है?
*3. महापौर और अधिकारियों की जवाबदेही कहां है? जनता के टैक्स के पैसों पर पलने वाले और शहर की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार महापौर व प्रशासनिक अधिकारी अपनी कुर्सियों पर बैठकर किस बात का जश्न मना रहे हैं?
4. नेताओं की जिद बड़ी या जनता की जान? अपनी वाहवाही और चाटुकारिता के फेर में बेकसूर जनता की जान जोखिम में डालने वाले इन नेताओं पर नैतिक और कानूनी कार्रवाई कब होगी?
5. भूख हड़ताल पर अनसुनी क्यों? पिछले 8 दिनों से अनशन पर बैठे पहलाद पांडे की जायज मांगों को दबाने और नजरअंदाज करने के पीछे आखिर किसका संरक्षण है?
क्या इंदौर का प्रशासन और जनप्रतिनिधि किसी बड़ी त्रासदी के बाद ही अपनी नींद से जागेंगे, या यह तानाशाही यूं ही आम नागरिकों की जान से खेलती रहेगी?
राजेश निगम (प्रदेश अध्यक्ष)
भारतीय पत्रकार सुरक्षा परिषद एवं अखिल भारतीय कायस्थ महासभा
