88 हजार से अधिक मरीजों का उपचार और 2.10 लाख से ज्यादा पौधारोपण… सवाल यह नहीं कि कितना हुआ, सवाल यह है कि समाज इससे क्या सीख रहा है?
(वरिष्ठ पत्रकार राजेश निगम)
वाराणसी/ इंदौर हमारे समय की सबसे बड़ी विडंबना शायद यही है कि समाज में समस्याएं बढ़ती जा रही हैं और समाधान के लिए सरकार, व्यवस्था और संस्थाओं की ओर देखने की हमारी आदत भी उतनी ही मजबूत होती जा रही है। ऐसे समय में जब सेवा शब्द भी कई बार आयोजन, फोटो और प्रचार तक सिमट जाता है, सर्वेश्वरी समूह की वार्षिक गतिविधियों का प्रतिवेदन एक अलग तस्वीर सामने रखता है।
आंकड़ा छोटा नहीं है—एक वर्ष में 88,390 रोगियों का उपचार, विभिन्न स्थानों पर स्वास्थ्य सेवाएं, 2,10,500 से अधिक पौधारोपण, बीज गोलियों के माध्यम से वन क्षेत्रों में हरियाली बढ़ाने का प्रयास, आदिवासी और पिछड़े क्षेत्रों में सेवा, जरूरतमंदों को वस्त्र और सामग्री वितरण तथा विद्यार्थियों को शिक्षा के लिए प्रोत्साहन।
लेकिन पत्रकारिता का काम केवल आंकड़ों पर तालियां बजाना नहीं है। असली सवाल तो यह है कि इन आंकड़ों के पीछे छिपी सोच क्या है?
जहां सड़क नहीं, वहां सेवा पहुंची यही असली परीक्षा
प्रतिवेदन में छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के एक दुर्गम, सड़कविहीन गांव का उल्लेख है, जहां सेवा दल पहुंचा और जरूरतमंद आदिवासी परिवारों के बीच सामग्री वितरित की। वहां के एक बुजुर्ग की प्रतिक्रिया इस पूरे अभियान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाती है, क्योंकि उनके अनुसार शासन-प्रशासन या किसी संस्था की ओर से इस तरह की सेवा के लिए पहले कोई नहीं पहुंचा था।
यहीं से सेवा और दिखावे के बीच अंतर समझ में आता है।
जिस व्यक्ति तक पहुंचना आसान है, वहां सेवा करना सरल है। लेकिन जिस तक पहुंचने के लिए दस किलोमीटर दुर्गम रास्ता तय करना पड़े, जहां सुविधा नहीं है और जहां कैमरे भी शायद न पहुंचें वहां पहुंचना सेवा की असली परीक्षा है।

पर्यावरण के क्षेत्र में 2.10 लाख से अधिक पौधारोपण का आंकड़ा निश्चित रूप से प्रभावशाली है। जशपुर में दो लाख से अधिक बीज गोलियों को पहाड़ी क्षेत्रों में फैलाने और नरसिंहगढ़ में एक लाख से अधिक बीज गोलियों के रोपण का उल्लेख भी किया गया है। जशपुर की उपलब्धि को गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में स्थान मिलने की बात भी प्रतिवेदन में दर्ज है।
सेवा केवल मनुष्य की नहीं प्रकृति की भी
इस प्रतिवेदन की एक अच्छी बात यह है कि सेवा का दायरा केवल मनुष्य तक सीमित दिखाई नहीं देता। भीषण गर्मी में पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था, देशी गो-पालन, देशी बीज और जल संरक्षण जैसे विषयों को भी अभियान में शामिल किया गया।
यह सोच महत्वपूर्ण है, क्योंकि पर्यावरण संरक्षण केवल पेड़ लगाने का नाम नहीं है। जल, जंगल, जमीन, पशु-पक्षी और मनुष्य इन सभी को एक साथ देखने की जरूरत है।
शिक्षा में मेडल से ज्यादा जरूरी है अवसर
संस्था ने विद्यार्थियों को मेडल, प्रशस्ति-पत्र और छात्रवृत्ति देने के साथ जरूरतमंद बच्चों को स्कूल बैग, किताबें, कॉपियां, लेखन एवं खेल सामग्री उपलब्ध कराने तथा गरीब परिवारों के बच्चों के लिए भोजन, आवास और शिक्षा की व्यवस्था का भी उल्लेख किया है।
यहां भी एक बड़ा सवाल है, क्या हम शिक्षा को केवल नौकरी पाने का माध्यम मानते रहेंगे या उसे चरित्र निर्माण का साधन भी बनाएंगे?

गुरुदेव के संवाद में इसी बात की चिंता दिखाई देती है कि आज की शिक्षा अधिकतर व्यावसायिक होती जा रही है और जीवन-मूल्य पीछे छूट रहे हैं।
यह सवाल केवल किसी एक धर्म, संस्था या समाज का नहीं है। यह पूरे भारतीय समाज का प्रश्न है।
डिजिटल युग में गुरु की जरूरत क्यों महसूस हो रही है?
आज मोबाइल फोन ज्ञान का सबसे आसान माध्यम बन गया है। कुछ सेकंड में दुनिया की जानकारी स्क्रीन पर आ जाती है। लेकिन जानकारी और जीवन-बोध में अंतर है।
गुरुदेव के अनुसार केवल मोबाइल पर गुरु को देख लेने से बात पूरी नहीं होती; व्यक्ति को स्वयं अपने जीवन में परिवर्तन के लिए प्रयास करना पड़ता है।
शायद यही आज की सबसे बड़ी चुनौती है, हम जानकारी बहुत तेजी से ग्रहण कर रहे हैं, लेकिन उसे जीवन में उतारने की गति बहुत धीमी है।

गुरु पूर्णिमा का अर्थ फूल चढ़ाना नहीं, विचारों को जीवन में उतारना है
वार्षिक संवाद में महापुरुषों की वाणी का अध्ययन, मनन और चिंतन कर उनके बताए रास्ते पर चलने की बात कही गई है।
यह बात आज इसलिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि हम महापुरुषों को सम्मान देने में तो आगे हैं, लेकिन उनके विचारों को अपने व्यवहार में उतारने में पीछे दिखाई देते हैं।
हम गुरु को प्रणाम करते हैं, लेकिन क्या गुरु के बताए रास्ते पर चलते भी हैं?
हम पर्यावरण दिवस मनाते हैं, लेकिन क्या पेड़ बचाते हैं?
हम सेवा की बातें करते हैं, लेकिन क्या उस व्यक्ति तक पहुंचते हैं जिसकी आवाज हमारे शहर तक नहीं आती?
यही वे सवाल हैं जिनका जवाब किसी भी सेवा अभियान की वास्तविक सफलता तय करेगा।
सेवा संगठनों की अगली चुनौती आंकड़ों से प्रभाव तक
सर्वेश्वरी समूह का प्रतिवेदन निश्चित रूप से बड़े पैमाने पर किए गए सेवा कार्यों को सामने रखता है। लेकिन अब समय आ गया है कि सामाजिक संस्थाएं अपनी उपलब्धियों को केवल संख्या में नहीं, बल्कि दीर्घकालीन प्रभाव में भी मापें।

कितने मरीज स्वस्थ हुए?
कितने पौधे जीवित रहे?
कितने बच्चों की शिक्षा लगातार जारी रही?
कितने परिवार आत्मनिर्भर हुए?
कितने गांवों में स्थायी बदलाव आया?
इन सवालों के जवाब किसी भी सेवा अभियान को और अधिक विश्वसनीय बनाएंगे।
और अंत में…
सर्वेश्वरी समूह की गतिविधियों को पढ़ते हुए एक बात साफ दिखाई देती है, समाज में अभी भी ऐसे लोग और संस्थाएं मौजूद हैं जो सरकार से सवाल करने के साथ-साथ अपने स्तर पर कुछ करने में विश्वास रखते हैं।
लेकिन यह भी सच है कि किसी एक संस्था की सेवा से देश की सारी समस्याएं खत्म नहीं होंगी।
जरूरत इस बात की है कि सेवा की यह भावना समाज में फैलती जाए।
क्योंकि सरकार व्यवस्था चला सकती है, कानून बना सकती है और योजनाएं लागू कर सकती है; लेकिन समाज को संवेदनशील बनाने का काम समाज को ही करना होगा।
और शायद सर्वेश्वरी समूह की इस पूरी यात्रा का सबसे बड़ा संदेश भी यही है,
सेवा तब सार्थक होती है, जब वह किसी के जीवन में बदलाव लाए और उस बदलाव से दूसरे व्यक्ति को भी सेवा करने की प्रेरणा मिले।
राजेश निगम
मध्यप्रदेश, प्रदेश अध्यक्ष भारतीय पत्रकार सुरक्षा परिषद, म. प्र. प्रदेश चीफ ब्यूरो पूर्वांचल की जंग & भारत श्रेया टाइम्स एवं अखिल भारतीय कायस्थ महासभा
